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Tuesday, June 18, 2013

क्या तुम मुझे….



















अक्सर
कुछ टूटे फूटे से शब्द
जब भी मैंने
कहे तुमसे 
वो बन गए अर्थपूर्ण 
एक ग़ज़ल 

थक के
बहुत टूट गयी हूँ मैं 
चाहती हूँ 
खुद को समर्पित
कर दूं तुमको 
क्या तुम मुझे…. 

© मधु अरोरा 
१७ / ६ / १३ 

Sunday, November 27, 2011

अक्सर भूल जाते हैं



तुम्हारी याद से दिन निकलता है
तुम्हारी याद पर ख़त्म होता है
दिन का हर एक लम्हा
तुम्हारी याद में रोता है

तुम्हें याद कर के
सोचते हैं हम दिन भर
तुम्हें आज ये कहना है
तुम्हें आज वो कहना है

मगर जब सामने आते हो
और आँखों से मुस्कुराते हो
तुम्हें क्या क्या कहना है
हम सब कुछ भूल जाते हैं

न खुद का होश होता है
न कोई ख्वाब सोता है
फिर भी कहते हो तुम अक्सर
तुम्हें हम याद नहीं करते

तुम्हें कैसे समझाएं जानम 
तुम्हारी यादों से हमे फुर्सत नहीं मिलती
मगर आती है ऐसी याद तुम्हारी
हम खुद को अक्सर भूल जाते हैं
२७/११/२०११ 
मधु अरोरा 

Thursday, February 12, 2009

मौन भाषा

तुम्हें देख कर
अक्सर सोचा मैंने
तुम्हें देखा है कहीं
ख्वाब में
ख्याल में
या हकीकत में कहीं
या पिछले जनम कहीं
तुम्हारा चेहरा
कुछ पहचाना सा लगा
शब्द ढूंढती रही
पढने को
तुम्हारी आँखों की
मौन भाषा
१०/१२/२००८