अक्सर
कुछ टूटे फूटे से शब्द
जब भी मैंने
कहे तुमसे
वो बन गए अर्थपूर्ण
एक ग़ज़ल
थक के
बहुत टूट गयी हूँ मैं
चाहती हूँ
खुद को समर्पित
कर दूं तुमको
क्या तुम मुझे….
© मधु अरोरा
१७ / ६ / १३
मुझसे कोसों दूर तुम
मेरी हर सोच से अंजान
मेरे हर ख्याल में तुम
मै तुम्हारे ख्याल में
कहीं नहीं
फिर भी चाहता है दिल
तुमसे ये कहना
होली मुबारक हो जाना
26/3/2013
©मधु अरोरा
तू पानी
मैं प्यास ज़मीं की
बूँद बूँद मुझे
तुझमे समां जाने दे
मैं जेठ की तपती धूप
तू छाँव दरख्तों की
मुझको तुझमे
पनाह लेने दे
तू गगन
मैं बादल तेरा
अपने रूप में मुझको
ढल जाने दे
तू चाँद
मैं चांदनी तेरी
मुझे तुझसे
निखर जाने दे
तू जिस्म
मैं रूह तेरी
मुझको तुझ से
मिल जाने दे
मधु अरोरा
१५/६/१२

जी चाहता है
खो जाऊँ
इन्ही अंधेरों में
जिनसे निकली थी मैं
रौशनी की
तस्वीर बनकर
गम जाऊँ
गुमनामी के
आवारा बादलों के संग
लिपट जाऊँ
अंधेरों की
हमनशीं बनकर
भूल जाऊँ
उजालों को
उजड़ी जागीर समझकर
कोई रात
न सवेरा हो
कोई मंजिल
न चेहरा हो
न घर
न डेरा हो
न धुप
न चाँदनी हो
एक गुमनामी का
तपता रेगिस्तान
और सिर्फ़ मैं
मेरे लिए
२७/२/२००८