Showing posts with label मैं. Show all posts
Showing posts with label मैं. Show all posts

Tuesday, June 18, 2013

क्या तुम मुझे….



















अक्सर
कुछ टूटे फूटे से शब्द
जब भी मैंने
कहे तुमसे 
वो बन गए अर्थपूर्ण 
एक ग़ज़ल 

थक के
बहुत टूट गयी हूँ मैं 
चाहती हूँ 
खुद को समर्पित
कर दूं तुमको 
क्या तुम मुझे…. 

© मधु अरोरा 
१७ / ६ / १३ 

Tuesday, March 26, 2013

होली मुबारक




















मुझसे कोसों दूर तुम
मेरी हर सोच से अंजान 
मेरे हर ख्याल में तुम 
मै तुम्हारे ख्याल में 
कहीं नहीं
फिर  भी चाहता है दिल
तुमसे ये कहना 
होली मुबारक हो जाना 

26/3/2013
©मधु अरोरा

Friday, June 15, 2012

तू और मैं


























तू पानी
मैं प्यास ज़मीं की
बूँद बूँद मुझे
तुझमे समां जाने दे

मैं जेठ की तपती धूप 
तू छाँव दरख्तों की
मुझको तुझमे
पनाह लेने दे

तू गगन
मैं बादल तेरा
अपने रूप में मुझको
ढल जाने दे

तू चाँद
मैं चांदनी तेरी
मुझे तुझसे
निखर जाने दे

तू जिस्म
मैं रूह तेरी
मुझको तुझ से
मिल जाने दे

मधु अरोरा
१५/६/१२ 

Saturday, June 7, 2008

सिर्फ़ मैं





जी चाहता है



खो जाऊँ



इन्ही अंधेरों में



जिनसे निकली थी मैं



रौशनी की



तस्वीर बनकर



गम जाऊँ



गुमनामी के



आवारा बादलों के संग



लिपट जाऊँ



अंधेरों की



हमनशीं बनकर



भूल जाऊँ



उजालों को



उजड़ी जागीर समझकर



कोई रात



न सवेरा हो



कोई मंजिल



न चेहरा हो



न घर



न डेरा हो


न धुप
न चाँदनी हो



एक गुमनामी का



तपता रेगिस्तान



और सिर्फ़ मैं



मेरे लिए



२७/२/२००८