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Friday, May 25, 2012
Friday, March 16, 2012
ख्वाबों की चादर
तुम्हारे ख्यालों के
सतरंगी धागों से
ख्वाबों की चादर
बुनती हूँ
और फिर
उसी चादर को ओढ़ के
सो जाती हूँ
तुम्हारे ही खवाबों में
खो जाती हूँ
सुबह होते ही
सब खवाब
छू हो जाते हैं
मेरे ख्वाबों की चादर
फिर तार - तार हो जाती है
और फिर दिन भर
मैं उन्हें फिर से
बटोरती हूँ
और रात में जब
सब सो जाते हैं
मैं फिर से बुनने लगती हूँ
और फिर से ख्वाब सजाती हूँ
कुछ मेरे लिए
कुछ तुम्हारे लिए
१५/०३/२०१२
मधु अरोरा
Tuesday, December 20, 2011
Tuesday, August 12, 2008
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